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बादलों के बीच सुकून से समय बिताने के लिए लैंसडाउन सबसे शानदार जगह

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महानगर के समीप अगर कोई हिल स्टेशन हो, तो आज की भागती जिंदगी के लिए वह सोने पर सुहागे से कम नहीं है। दिल्लीवासियों के लिए उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल सबसे पसंदीदा वीकेंड गेटवेज में से एक हैं। खासकर, ऋषिकेश, मसूरी, नैनीताल, शिमला, मनाली आदि। लेकिन यहां कई बार भीड़ छुट्टियों का मजा किरकिरा भी कर देती है। इनमें उत्तराखंड का लैंसडाउन थोड़ा अलग है, जहां सुकून के साथ मिलता है प्रकृति के बीच समय बिताने का मौका... प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक लाओ सू ने कहा था कि एक अच्छे यात्री की कोई निश्चित योजना नहीं होती है और न ही वह कहीं पहुंचने की इच्छा या अभिलाषा रखता है। वह बस चलते ही रहना चाहता है। हमारे घुमक्कड़ों का समूह भी कुछ ऐसी ही ख्वाहिश रखता था। इसलिए मौका मिला नहीं कि मन शहर से बाहर निकलने को आतुर हो जाता है। वीकेंड पर लैंसडाउन जाने का प्लान भी यूं ही बन गया। दिल्ली से करीब 270 किमी. की दूरी पर स्थित पहाड़ी स्थल सैलानियों की भीड़-भाड़ से अभी भी काफी हद तक बचा हुआ है। तय हुआ कि अहले सुबह पौ फटने से पहले निकल पड़ेंगे, जिससे ट्रैफिक की बाधा न मिले। हमने दिल्ली-मेरठ-बिजन...

राजगीर यात्रा एक अनुभव

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बहुत वर्षों के बाद आज मन किया कि फिर से बच्चा बनूं, अपने बचपन में खो जाऊं तो निकल गया एक पहल‌ की ओर। जिस विद्यालय में मैंने बचपन में पढाई की थी उसी विद्यालय की तरफ से आज बच्चों को राजगीर भ्रमण के लिए ले जाया जा रहा था तो मेरे अंदर का बच्चा फिर से जागृत हो गया। मैंने अबधेश सर से बात की तो उन्होने अपनी सहमति दे दी, फिर क्या था मैं भी सुबह चल दिया। सुबह लगभग 7 बजे मैं अपने घर से राजगीर की ओर निकला, मन में एक अजीब सी कसमकस थी। मैं बहुत ही उघेरबुन में मन को एकाग्र किए चुपचाप चला जा रहा था। सुबह इतनी ठंड के कारण हाथ पैर मानो बर्फ हो रहा था, सड़कों पर घने कोहरे के कारण आगे का कुछ साफ दिखायी नही पड़ रहा था, गाड़ी ऐसे चल रही थी मानो उसे भी ठंड में ठंड मार गया क्योंकि सड़कें कोहरे के कारण साफ दिखाई नही दे रही थी और सड़कें शीत के कारण भीगी थी और घने कोहरे के कारण साफ दिखाई नही दे रहा था। हमारे साथ में अवधेश सर, मो. इमामुद्दीन इद्रीशी सर व कक्षा १०वीं के लगभग ५० बच्चे जा रहे थे। बच्चे काफी उत्सुक दिख रहे थे क्योंकि वे प्रथम बार राजगीर जा रहे थे। हमलोगो ने पटना होते हुए यात्रा प्रारंभ की करी...

बूढा केदार की यात्रा

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नव वर्ष के उपलक्ष्य में मैं और मेरे मित्र अमित रतूडी वर्षो से उपेक्षित एवं अंतर्मन को शांति प्रदान करने वाला स्थान बूढा केदार जाने का फैसला किया।  हमलोग सुबह 8 बजे तैयार होकर निकल पड़े  मंजिल की ओर , देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार से दूरी लगभग 250 किमी थी, लेकिन मन में जो ठान लिया वह करना ही था इसीलिए हमलोग दोपहिया वाहन स्कुटी से ऋषिकेश, नरेन्द्र नगर, चम्बा, टिहरी, घनसाली होते हुए बूढा केदार पहुंचे। उस ठंड के समय सुबह जब मै निकला तो मन काफी हर्षित और उत्साहित था मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि वह स्थान कैसा होगा जहां हम जा रहे हैं आ ज कुछ नया सीखने को मिलेगा नये-नये लोग मिलेंगे,नये-नये अनुभवो को अपने अंदर समेटने की ललक को लेकर चल पड़ा  था। ठंड काफी थी तो सर्वप्रथम नरेन्द्र नगर में रुककर चाय पी फिर यात्रा प्रारम्भ की वहाँ के टेढे-मेढे रास्ते काफी डरा रहे थे लेकिन मन की उत्सुकता के कारण वह डर भी धीरे-धीरे हमारे अंतर्मन से जाता रहा। जब हमारे हाथों ने काम करना बंद कर दिया तो कुंजापुरी के पास रुककर अपने हाथों को अाग से सेंककर चल दिए मंजिल की ओर। चलते-चलते ...