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ध्यान करने से मिलती है मानसिक शांति

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जीवन में योग का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान है। स्वस्थ रहने के लिए योग, प्राणायाम और ध्यान तीनों का समन्वय जरूरी है। योग और प्राणायाम से शरीर और ध्यान से मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। पिछले दिनों लॉकडाउन की वजह से घरों में बंद होने के कारण लोगों को कई मानसिक विकृतियों का सामना करना पड़ा। इस स्थिति में लोगों के सामने डिप्रेशन समेत कई परिस्थितियां सामने आयी जिसे लोगों को झेलना मुश्किल हो गया। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि वो ध्यान करें और मानसिक विकृतियों को दूर करें। यदि आप जीवन में उत्साह की कमी महसूस कर रहे हैं और आपकी भावनात्मक समस्याएं आपके काम पर असर डाल रही है तो आपको ध्यान अवश्य करना चाहिए। आपके दैनिक जीवन की समस्याओं को संभालने के लिए ध्यान बहुत आवश्यक है। क्या है ध्यान? ध्यान एक प्रकार की क्रिया है, जिसमें इंसान अपने मन को चेतन की एक विशेष अवस्था में लाने की कोशिश करता है। इसमें अपने मन को शांति देने से लेकर आंतरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति का निर्माण करना हो सकता है, जो हमारी जिंदगी में सकरात्मकता और खुशहाली लाती है। कैसे करें ध्यान? सबसे पहले शांत चित्त होकर शरीर ढीला करके बिल्कुल सी

पुस्तक अंश: सर्पीली पहाड़ी रास्तों पर चलकर लग रहा था जैसे मुथा नदी लुका-छिपी का खेल खेल रही हो

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चलते–चलते रास्ते में हमारे दाएं हाथ पर एक साइन बोर्ड लगा था, लिखा था ‘फर्स्ट कोर्ट’। यह जगह लवासा एंट्री गेट से कोई दो–ढाई किलोमीटर रही होगी। कुछ और आगे गए तो एक और साइन बोर्ड लगा था जिस पर लिखा था ‘सेकेंड कोर्ट’। ये नाम अपने आप में कुछ बताने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मेरी समझ से बाहर थे। बाद में पता चला कि वहाँ के पॉश रेसिडेंशियल इलाक़ों के नाम हैं। अभी कोई दो सौ मीटर आगे ही गए थे कि दाएँ हाथ पर ‘हेलिपैड’ का साइन बोर्ड दिखाई पड़ता है। रास्ते में एक घुमावदार टर्न पर सड़क के दाईं ओर गुलाबी रंग के फूल, झाड़ियाँ और पेड़ दिखाई पड़े। यों तो सड़क पर फूल, पत्ती और पेड़ों का मिलना कोई विचित्र बात नहीं लेकिन हरी–हरी झाड़ियों पर लगे वह गुलाबी फूल, हरा–भरा छितराया हुआ सा वह पेड़, वह साफ़–सपाट सर्पीली सड़क और कार के अंदर से देखने पर वह पूरा दृश्य दीवार पर लगी उस तस्वीर की तरह लग रहा था जिसे बड़े प्यार से एक सुंदर फ्रेम में लगाया गया हो। जैसे–जैसे आगे बढ़ रहे थे, वैसे–वैसे उस अदभुत स्थान को देखने की जिज्ञासा अपने चरम की ओर अग्रसर थी। अब हम शहर में दाख़िल होने ही वाले थे। कोई दो–ढाई किलोमीटर चलने के बाद बाएँ हा

कैसे कहूं कि तुम क्या हो मेरे लिए

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कैसे कहूं कि तुम क्या हो मेरे लिए। पूर्णिमा की चांद सी हो तुम, जो अपनी छटा से जग को रोशन करती है। घास पर पड़ी ओस की बूंद हो तुम, जो गगन से उतरकर भूमि में मिल जाती है। फूल की पंखुड़ियों में छिपी पराग हो तुम, जिसे फूल छिपाकर रखना चाहता है। समंदर की लहर सी हो तुम, जो दूर रहकर भी मुझमें समा जाती है। कैसे कहूं कि तुम क्या हो मेरे लिए।। वसंत की हवा हो तुम, जो पास से गुजर जाए तो बदन सिहर उठती है। पतझर के पत्ते सी हो तुम, जो पेड़ से बिछड़कर अपना अस्तित्व ढूंढती है। नदी की धार हो तुम, जो समुंदर में मिलकर खुद को भूल जाती है। पहाड़ की चोटी सी हो तुम, जो आकाश की बुलंदियों को छूना चाहती है। कैसे कहूं कि तुम क्या हो मेरे लिए।। नवनीत कुमार जायसवाल

हिमालय दिवस: एक यात्रा रोहतांग दर्रे तक की

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रोहतांग दर्रा हिमालय (भारत) में स्थित एक प्रमुख दर्रा है। यह मनाली को लेह से सड़क मार्ग द्वार जोड़ता है। यह दर्रा समुद्र तल से 4,111 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। इस दर्रे का पुराना नाम 'भृगु-तुंग' था, 'रोहतांग' नया नाम है। यहाँ से पहाडों, सुंदर दृश्‍यों वाली भूमि और ग्‍लेशियर का शानदार दृश्‍य देखा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के लाहोल-स्पीति ज़िले का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला यह दर्रा कभी 'भृगु तुंग' के नाम से पुकारा जाता था। यह बौद्ध सांस्कृतिक विरासत के धनी लाहोल-स्पीति को हिन्दू सभ्यता वाले कुल्लू से प्राकृतिक रूप से बाँटता है। मनाली से रोहतांग दर्रे तक पहुँचने के लिए क़रीब पचास किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। यहाँ मौसम अचानक बदल जाता है। बर्फीली हवा से बचकर रहना पड़ता है अन्यथा तबीयत खराब होने का भय बना रहता है। रोहतांग दर्रा पार करने से लेकर वापिस आने तक बहुत ही जोखिम भरा पर्यटन होता है। सुबह मनाली से यात्रा प्रारंभ की थी। यहाँ की पर्वत श्रृंखलाएँ पल-पल अपना रंग बदलतीं है। खूबसूरत दृश्यों को एकटक देखते रहिए पर जी नहीं भरता। सूर्य रश्मियों से पहाड़ों की खूबसूरती

HAPPY BIRTHDAY: कभी छोटी पार्टियों में गाना गाकर जुटाते थे पैसे, आज इन गानों से सुपरहिट गायक हैं गुरु रंधावा

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पंजाबी के सबसे पॉपुलर सिंगर्स में से एक गुरु रंधावा का आज जन्मदिन है। आज गुरु अपना 29वां जन्मदिन मना रहे हैं। गुरु रंधावा को इंडस्ट्री में आए ज्यादा साल नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता कई दिग्गज सिंगर्स से भी ज्यादा है। गुरु रंधावा ने अपने करियर की शुरुआत बतौर गायक साल 2012 में की। उनका पहला गाना 'सेम गर्ल' हिट नहीं हो सका। साल 2013 में गुरु रंधावा ने अपनी पहली एलबम 'पैग वन' को लॉन्च किया था। यह भी बहुत हिट नहीं हो सका। इसके बाद गुरु रंधावा ने मशहूर रैपर बोहेमिया के साथ मिलकर साल 2015 में 'पटोला' गाना बनाया। इस गाने से रातों-रात रंधावा की किस्मत चमक गई। पार्श्व गायक गुरु रंधावा गाने लिखने के अलावा धुन भी बनाते हैं। बीते कुछ सालों में उनके 'हाई रेटेड गबरू, बन जा तू मेरी रानी, लगदी लाहौर दी, तेनू सूट सूट करदा, मेड इन इंडया, इशारे तेरे' जैसे गाने खूब पॉपुलर हुए। इसी वजह से गुरु रंधावा के गानों के पास सबसे ज्यादा सुने जाने का रिकॉर्ड है। एक्टर के एक-एक गाने के व्यूज लाखों में नहीं बल्कि करोड़ों में हैं। वहीं, उनके हर गाने को 30-50 करोड़ तक व्यूज मिलते है

बिहार की प्रचलित कुप्रथा 'पकड़ौआ विवाह' के पीछे की वजह और सच्चाई

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पकड़ौआ विवाह खासकर बिहार राज्य में प्रचलित एक कुप्रथा है। इसमें शादी योग्य लड़के को घर या उनके कार्यस्थल से अपहरण कर तय जगह पर ले जाते हैं और जितनी जल्दी (25-30 मिनट) में शादी कर देते हैं। शादी के लिए नहीं मानने पर लड़के के साथ मारपीट की जाती है। गोली मारने की धमकी दी जाती है। हथियार से आतंकित कर जबरदस्ती लड़की की मांग में सिंदूर डलवाया जाता है। क्यों:- इसके पीछे बड़ी वजह दहेज था। ज्यादा दहेज देने से सक्षम न होने के कारण गांव के लोग अपने जानने वालों से पता कर एक लड़के का चुनाव करते थे। जो ढंग का कमाता हो या जमीन-जयदाद ज्यादा हो। खेती बाड़ी खुद संभालता हो। उसके पीछे काफी मेहनत करते थे। जैसे- बार बार जाकर लड़के के पिता को कहना कि आपके लिए हमने एक लड़की देखी है अगर कहो तो आपके बेटे की शादी करवा देता हूं, लड़की अच्छी है। अगर नहीं माने तो फिर हंसी मजाक में कह देते थे कि आपके लड़के को उठवा लूंगा। इसके बाद वो तैयारी करना शुरू कर देते थे। मौका मिलते ही लड़के को हथियार के बल पर और दबंगों की सहायता से उठवा लिया जाता था। शादी के बाद:- शादी के बाद लड़का कहता है कि मैं फांसी पर चढ़ गया। अब लड़की और लड़के के गांव

हैलो भाइयों बहनों, नमस्कार, मैं इरफ़ान आज आपके साथ हूँ भी और नहीं भी...

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कई बार कुछ कलाकार हीरोगीरी वाली लाइन पार करके आपके दिल में उतर जाते हैं. इतना उतर जाते हैं कि आप उनके डायलॉग रोजाना अपनी भाषा में इस्तेमाल करने लगते हैं और इरफ़ान हमारे लिए तुम वही थे. दुनिया के लिए रहे होंगे बहुत बड़े अभिनेता जिसने हॉलीवुड की फिल्मों में भी काम किया था लेकिन मेरे लिए "पान सिंह तोमर" के सूबेदार चचा थे. वही सूबेदार चचा जो कहते हैं कि "अंग्रेज भगे मुल्क से, पंडिज्जी परधानमंत्री बने और नव भारत के निर्माण के संगे-संगे हमाओ भी निर्माण शुरू भओ". आज सूबेदार चचा चले गए तो उनका ही एक डायलॉग याद रह गया जिसमे वो कहते हैं कि "जे बात को जवाब कौन देगा दद्दा, हम ऊपर आकर भी जवाब लेंगे". तुम वही कहते थे जो हमें सुनना था- तुम्हारे डायलॉग बर्फ की पहाड़ियों में खड़े किसी अभिनेत्री के साथ नहीं थे. बल्कि बीहड़ में घूम रहे एक बागी के डायलॉग थे जिन्हे सुनकर लगता था यार क्या ही बोल गया. ये तो मतलब मजा आ गया. चाहे बात हासिल के रणविजय सिंह की हो या फिर हिंदी मीडियम में साडी बेच रहे उस दुकानदार की, हर बार तुमने दिल जीता है. अब तुम्हारे चले जाने पर तरह-तरह के बयान आएँगे। ल

फैंस के नाम इरफान खान का पत्र...

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कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं, मैंने पहली बार यह शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस बीमारी पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं, क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है. अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनायें, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, “आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.’ मेरी समझ में नहीं आया, “ना ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.’ जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टाप पर आपको उतरना होगा, आपका गन्तव्य आ गया. अचानक एहसास होता है कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में, अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं… लहरों को क़ाबू कर लेने की ग़लतफ़हमी लिए. इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, “आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं… मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर

अभी नहीं तो कब सुधरोगे बिहार वालों?

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वर्तमान में सबसे ज्यादा लट्ठ बजाने की जरूरत बिहार में है। आज भी गांधी सेतु पर दरभंगा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर आदि जगह जाने वाली बसों में खचाखच भीड़ है। लोग बस की छतों पर बैठकर सफर कर रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और इसी जानबूझकर आस में अभी तक पटना में बैठे थे कि ये तामझाम एक दो दिन में खत्म हो जाएगा तो हम काम कर सकेंगे। जब बिहार लॉकडाउन हुआ तब जाकर समझ में आया कि अब कोई चारा नहीं है। अब बोरिया बिस्तर समेटकर घर पहुंचने नहीं भाग ने की फिराक में एक का तीन गुणा भाड़ा देकर घर जा रहे हैं। इन्होंने ये स्थिति जान बूझकर बनाई है। वैसे अमूमन दरभंगा जाने में 200-300 रुपये लगते हैं लेकिन वर्तमान में 600-700 रुपये देकर लोग घर जा रहे हैं। दुःख इस बात का है कि पिछले 10 दिनों से सूचना दी जा रही है कि ज्यादा से ज्यादा खुद को बचाने की कोशिश करें फिर भी ये लोग नहीं मान रहे हैं। शायद इन लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि अगर ये महामारी गांव तक पहुंच गया तो स्थिति कितनी विकट होगी। वैसे भी स्वास्थ्य सेवा के मामले में बिहार फिसड्डी है। लोग अच्छे डॉक्टर से दिखाने के बजाय

गंगा को लेकर स्वामी शिवानंद ने शुरू लिया अनशन

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दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर गंगा रक्षा को लेकर चल रहे अनशन की शुरुआत डेढ़ साल पहले हुई थी। इस कड़ी की शुरुआत ब्रह्मलीन प्रोफेसर ज्ञान स्वरूप सानंद ने की थी। मुझे याद है 9 अक्टूबर 2019 को मैं हरिद्वार गया था और रात मैं ज्वालापुर मेरे मित्र (हिमांशु भट्ट) के यहां रुका था। सुबह अचानक पता चला कि आश्रम पर पुलिस तैनात हो गई है और सानंद जी को AIIMS ऋषिकेश भेजने की तैयारी हो रही है। उन्हें भर्ती कराया गया। अनशन तोड़ने के लिए कई बार फ़ोर्स फीडिंग कराई गई। उनकी मौत के बाद क्रमिक अनशन चल ही रहा है। यहां तक कि इसके लिए प्रयागराज के कुंभ में भी जाकर अनशन किया गया था। वर्तमान में ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने दिल्ली एम्स से लौटकर 40वें दिन अपना अनशन समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही साध्वी पद्मावती का अनशन 88वें दिन भी दिल्ली एम्स में जारी है।   राज्य में डबल इंजन की सरकार है। केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हरिद्वार से सांसद हैं। राज्य में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक हरिद्वार से विधायक हैं। फिर भी इस मुद्दे पर दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पा रही है। पहले तो कोई बात करने भी नहीं आय